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मेरा पहला प्रेम

  • Mar 3, 2017
  • 5 min read

दुनिया में यदि कोई सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला सवाल है तो वह यह है की क्या आपने किसी से प्रेम किया है| यह शायद कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है या कुछ लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक भी न रखे... लेकिन सबकी जिन्दगी में यह सवाल एक न एक बार जरुर आता है..पिछले दिनों मुझसे भी किसी ने यह सवाल किया की क्या आपने कभी किसी से प्रेम किया है... शायद आप लोग मेरा जवाब सुनने को उत्सुक होंगे लेकिन यह जानकार आपको कुछ खास मजा नही आएगा की मैंने उसे जवाब देने के बजाय प्रेम पर 40 मिनट की एक क्लास ही ले ली... वह मेरी बातों से सहमत हुआ की नही यह मै भरोसे से नही कह सकता.....




प्रेम को लेकर मेरा मत भिन्न हो सकता है या फिर मैं किसी और के मत के करीब भी पहुँच सकता हूँ... यहाँ सभी लोगों को विचार करने और उसे व्यक्त करने का पूरा अधिकार है.. मेरा मानना है की दुनिया में प्रत्येक जीवधारी प्रेम के कारण ही एक दूसरे से बधें हुए है और यही कारण है की दुनिया अभी तक चल रही है बावजूद इसके की कई बार संसार के खत्म होने की भविष्यवाणी की जा चुकी है..मैं कहता हूँ की प्रेम किसी से भी हो सकता है..इसका मतलब है की प्रेम आपको अपने परिवार से,माता –पिता से, भाई बहन से,पड़ोसी से,अपने कुत्ते से, घर से, मकान से, गली से, गाँव से और अपनी प्रेमिका से ,या फिर अपने से बड़ी उम्र की किसी स्री से हो सकता है और हाँ आपको पेड़ पौधों से भी प्रेम हो सकता है पेड़ पौधों से प्रेम तो हमारे यहाँ के मेजर सिंह साहब ने भी किया था और इसी प्रेम के कारण उनका नाम मेजर झाड़ साहब हो गया था..


कटिहार शहर से 80 किलोमीटर दूर त्योंथर में लगभग 5 से 7 साल पहले एक कॉलोनी हुआ करती थी और जो की जे.पी सीमेंट फैक्ट्री की कॉलोनी थी लेकिन अब यहाँ वीरानी छाई हुई है और यहाँ के मकान जमींदोज होने को उतावले है ठीक उस फैक्ट्री की तरह जो एक जमाने में आस पास के कई गावं के लोगों का पेट भरा करती थी..कुछ बुजुर्गो का कहना है की भ्रष्ट लोगों ने फैक्ट्री को खा लिया| कैसे, यह मुझे अभी तक समझ नही आया है.. बात उन दिनों की है जब मैं कॉलोनी के ही स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ा करता था..सुबह सफ़ेद हाफ पेंट और सफ़ेद शर्ट पहन कर स्कूल जाता था और शाम को बाबूजी और बड़े भैया के साथ बजार की सैर करने जाया करते थे.. इन्ही दिनों हमारे यहाँ एक नये अधिकारी मेजर सिंह साहब आये जो की हमारे पड़ोस वाले घर में रहने आये.. पतले-दुबले, हमेशा बुलेट से चलने वाले मेजर साहब के बारे में यह बात प्रचलित थी की जब वे सेना में थे तब उन्हें गोली लगी थी और उसका जख्म अभी भी उनके दिमाग में था.. यदि वह सिगरेट न पिए तो मर सकते थे... बात कितनी सच्ची या झूठी थी यह कहना मुश्किल था लेकिन यह सच था की मेजर साहब सिगरेंट बहुत पीते थे...उनके सिगरेंट पीने के कारण मेरा बाल मन भी उन कहानियों पर विश्वास कर लिया करता था..मेजर साहब अधिकारी थे इस बात का पुख्त्ता प्रमाण यह था की वे अधिकारीयों के साथ वाले बंगले में रहते थे.. लेकिन वे काम क्या करते थे इस बारे में मझे कोई जानकारी नही थी..हाँ इतना वे जरुर करते थे कि कॉलोनी में जहाँ भी खाली जगह मिले वहाँ पौधे लगा देते थे.. वह पौधे ही नही लगाते थे बल्कि पूरी तरह उनकी हिफाज़त भी किया करते थे..


कई बार उनका पेड़ों से अटूट प्रेम लोगों के लिए और हमारे जैसे उछल-कूद करने वाले लड़कों के लिए परेशानी का सबब भी बनता था..एक बार पेड़ पर चढ़कर उछल-कूद करने कि वजह से मेरे मित्र ने अपने दो दांत भी गंवा दिये थे.. खैर इतना तो जरुर हो गया था की मेजर साहब के आने के बाद से कसबे की रंगत बदल गयी थी और वहां सूखे की जगह हरियाली ने ले ली थी.. मेजर सिंह का काम यहीं नही रुका.. मैंने पहले ही कहा की मेजर साहब को मेरे जैसे बच्चे अपना दुश्मन मानते थे क्योकि वे हमे पेड़ पर उछल –कूद नही करने देते थे और न ही पौधों के बाहर उन जालियों को छूने देते थे जिन्हें उनकी हिफाज़त के लिए लगाया था.. लेकिन बाद में हम बच्चे उनके दोस्त बनगये और हमने भी उनका खूब साथ दिया..अक्सर मेजर साहब हमारे साथ बैठ जाया करते थे और हमे अपनी कहानियाँ सुनाया करते थे.. इस दोस्ती में भी मेजर साहब का अपना मतलब था.. वे बच्चों से आस-पास के इलाके से पेड़ काटकर लकड़ी चोरी करने वालों के बारें में जानकारी भी ले लिया करते थे.. हमारी दोस्ती के दौरान मेजर साहब ने हम बच्चों से भी कई जगह अनेकों पेड़ लगवाए.. इस दौरान मैंने घर से कुछ दूरी पर अशोक का एक पौधा रोपा और उसकी हिफाज़त करने लगा.. पौधे को कोई जानवर न खा जाये या कोई नष्ट न करदे इस चिंता से मै रोज सुबह शाम उस राश्ते पर जाने लगा और पौधे की देखभाल करने लगा.. पौधे से फूटती नई कोपलों और उन्हें पत्ती बनते देखना मेरे लिए सुखद अनुभूति हुआ करती थी और इस कार्य ने मझे प्रकृति के बेहद करीब भी पंहुचा दिया था..


लगभग एक साल के बाद अशोक का पौधा पेड़ बन गया था.. लेकिन वह सीधा न होकर कुछ जमीन की तरफ झुक गया था...इसका कारण मैंने वहाँ की मिटटी को दिया लेकिन सच्चाई क्या थी मुझे नही पता..एक दिन दोपहर का समय था जब मैं अपने बगीचें में पौधों पे मिटटी चढ़ा रहा था तभी पड़ोस के लोगों से जानकारी मिली की मेजरसाहब कॉलोनी छोड़ कर जा रहे थे.. यह समाचार मझे पीड़ा देने वाला था और इसकी पुष्टि करने के लिए मै मेजर साहब के घर पहुच गया..उस समय मेजरसाहब का परिवार अपना सामान बांध रहा था और लोग उनसे पहुचते ही ख़त लिखने ,फ़ोन पर बताने जैसी बात कह रहे थे..मेजर साहब ने जब मझे देखा तब वह खुद मेरे पास आये और उन्होंने मुझसे कहा की हमने काफी एकसाथ काम किया है, यहाँ के पेड़ों की देखभाल और इन पेड़ों को बचाने की जिम्मेदारी हमारी है...इस वाक्या के बाद मेजर साहब का परिवार कहाँ गया मझे इस बात की जानकारी नही है और न ही मैंने जानने की कोशिश की...हाँ मेजर सिंह साहब के जाने के बाद मझे कुछ कमी जरुर महसूस हुई.. दिन बीतते जा रहे थे लेकिन मेरा उस अशोक के पेड़ तक जाना और चिड़ियों से बातें करने का सिलसिला अनवरत जारी था..


मेरे जेहन में मेजर सिंह साहब ने भी अपनी अहम जगह बना ली थी.. मैं और अशोक का पेड़ लगातार मेजर साहब के बारें में बातें किया करते थे.. रोज यही सिलसिला चल रहा था.. मैं सुबह घर से निकलता,अशोक के झुके हुए पेड़ को लक्ष्य मानता और दौड़ लगा देता..पेड़ और चिड़ियों से बातें करना तथा वापस घर आकर स्कूल के लिए तैयार होना यह मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया था...उन दिनों जाड़े का मौसम था और बाबूजी के आदेश के अनुसार सुबह उठकर दौड़ लगाना जरुरी था..मेरा लक्ष्य मैं जानता था की मुझे झुके हुए अशोक के पेड़ तक जाना है और वहां से वापस आना है.. सुबह उठा और मुहं हाथ धोकर मैं मुख्य सड़क तक पंहुचा.. मैंने अशोक के पेड़ को लक्ष्य बनाया लेकिन अशोक का पेड़ दिखाई नही दिया..मैंने सोचा शायद अभी सूरज उगने में देरी है और अँधेरे की वजह से पेड़ छिपा हुआ है..मैं कुछ आगे बढ़ा लेकिन अभी भी नही दिखा.. मेरा मन घबराया और मैंने जोर की दौड़ लगा दी..जल्द ही पेड़ वाली जगह पर पंहुचा लेकिन तब वहाँ अशोक का सिर्फ जड़ ही था.. उसपर बैठने वाली चिड़ियाँ चहचहा नही रही थी, चुप थी|..शायद साथी के बिछड़ जाने का गम था..मैं जड़ के पास ठगा सा बैठा और मेरे आँखों से कब आंसू बहने लगे मझे इस बात का पता भी नही चला..पहली बार मझे किसी के दूर जाने के गम का एहसास हो रहा था..शायद यह मेरा पहला प्रेम था..

 
 
 

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© 2017 by Harshit Kumar Harsh

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